स्वर्णिम विचार – GOLDEN QUOTES

Advertisements

Geeta ke Saar Mantra

अथ चित्तं समधातुं शक्नोषि मयि स्थिरम्।अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुम् धनञ्जय।।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं यदि तू मन को मुझ में अचल रूप से स्थापित करने में समर्थ नहीं है तो अभ्यास रूप योग के द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर।

गीता में एक अन्य स्थान पर भगवान श्री कृष्ण मन को स्थिर करने मन को साधने की प्रक्रिया को बताते हुए अर्जुन को समझाते है कि

‘अभ्यासेन तू कौंतेय वैराग्येण च गृह्यते।’

अभ्यास और वैराग्य के द्वारा मन को स्थिर किया जा सकता है अभ्यास यानी प्रयास बार-बार प्रयास बार-बार प्रयास जब मनुष्य करता है तो धीरे-धीरे उस अभ्यास में स्थिर हो जाता है उसका मन टिकने लगता है और यही अभ्यास की विशेषता है वैराग्य संसार की नश्वरता का भाव इस संसार क्षणभंगुर है इसमें कोई भी चीज ऐसी नहीं है जो इसको प्राप्त करने के लिए व्याकुल हो जाए सब कुछ नष्ट होने वाला है इसलिए किसी भी चीज के लिए व्याकुल ना हो व्याकुलता हो तो ईश्वर को प्राप्त करने की परमात्मा को प्राप्त करने की और यही वैराग्य है वैराग्य का एक और अर्थ ले सकते हैं विशिष्ट रूप से राग। राग उसमें जो सत्य है और वैराग उससे असत्य है क्षण-भंगुर है!

वैराग और रात को समझने के लिए एक बड़ी सुंदर कथा है एक बार एक नदी किनारे तीन अफीमची एक नाव में बैठ गए और उन्होंने कहा चलो ऐसा करते हैं कि हम लोग यहां से बनारस निकल चलते हैं तीनों नौका में बैठ गए और रात भर नाव को खेते रही खेते रहे।

सुबह हो गई सुबह हुई तो एक का नशा कुछ कम हुआ तो वह बोला कि देखो घाट आ गया, दूसरा बोला हां घाट तो दिख रहा है, पास में ही हम लोग किनारे पर आ गए। तब तक तीसरे का नशा उतर चुका था वह बोला हम तो जहां थे वहीं पर है, और हम लोगों ने नौका रस्सा तो खोला ही नहीं था। बस यही रहस्य है हम लोगों के जीवन में आध्यात्मिक प्रगति इसीलिए नहीं हो पाती क्योंकि दैहिक संबंध और देह से प्रेम संसार और सांसारिक वस्तुओं से प्रेम हमारा कम होता ही नहीं और जब संसार की नश्वरता का भास नहीं होता तो मन आध्यात्मिक उत्थान की ओर वास्तविकता में प्रयत्नशील नहीं होता केवल प्रयत्नशील होने का आडंबर करता रहता है हम स्वयं को ही धोखा देते रहते हैं।