अधर्म का विनाश करते समय अपना पराया नहीं देखना चाहिये, व्रत का अर्थ समझो!

परित्राणाय साधूनां, भलाई की रक्षा करना| कृष्ण कथा, कृष्ण के रूप में नारायण हैं, राम कहें तो भी वे नारायण हैं| जब हम राम के नाम से उनकी कथा सुनते हैं तो वह रामायण बन जाती है जब हम कृष्ण के नाम से कथा सुनते हैं तो वह गीता बन जाती है|

जब अज्ञानता का अंधकार होता है तो परमात्मा की ज्योति आती है|

भगवान कर्म बन्धन से बंधे हुये, कर्म फल भोगने के लिये अवतार नहीं लेते हैं|

जन्म लेने से पूर्व ही दर्शन देकर, गोकुल पहुंचाने का आदेश दिया था| पैदा होते ही हथकड़ी बेड़ियॉं खुल गये, यह संसार रूपी कारागार में यह सोच कर बैठे रहते हैं कि ये बन्धन खुल नहीं सकते, तो यह समझना चाहिये कि बंधन उनकी कृपा से खुल सकते हैं|

अगर हमारे मन में भक्ति भावना है तो अन्तर्यामी हैं वह जो हमारी भलाई की वस्तु ही देता है|

लेकिन जो बुद्धिमान है भक्त है वो भगवान को ही पाना चाहता है|

जैसे माता देवकी ने भगवान को अपनी संतान के रूप में मॉंगा, तो भगवान ने स्ंतान के रूप में अवतार लिया|

चिंगारी से भी आग लग जाती है, इसी तरह बालक रूप में होने पर भी वे सर्वसमर्थ हैं|

जब वसुदेव भगवान को सूप में लेकर यमूना जी को पार करने लगे तो उस समय यमुना जी की लहरें ऊँची उठने लगीं, क्योंकि वे भगवान के चरण छूना चाहती थीं|

जिनकी इच्छा से लहरें उठती हैं, वे लहरें भीं भगवान के चरण स्पर्श करने का सौभाग्य नहीं छोड़ना चाहती हैं, जब भगवान ने उनकी इच्छा को पहचाना तो उन्होंने अपने चरण लटका दिये|

भगवान की रक्षा कोई नहीं करता, भगवान सबकी रक्षा करते हैं तभी तो जन्म लेते ही वे स्वयं सारे ताले हथकड़ियो को खोलकर गोकुल पहुंच गये|

कहते हैं कि धर्म के अनुसार किसी का वध करना उचित नहीं माना जाता, लेकिन जो अधर्म का कर्म करता हो वह स्त्री हो पुरुष हो, किसी भी जाति या समाज का हो, वध योग्य है|

पूतना के वध करते समय भगवान ने अपनी अॉंखें बंद कर लीं इससे यह शिक्षा दी कि अधर्म का विनाश करते, समय अपना पराया, नहीं देखना चाहिये|

उत्सव का अर्थ होता है, व्रत रहने से क्या अर्थ पूरा होता है, माता देवकी तो इसलिये लोग उपवास था क्योंकि वे तो कारागार में थीं|

परन्तु हमारा व्रत यह होना चाहिये कि हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो उनकी इच्छा के विरुद्ध हो, वही करेंगे जो उनकी इच्छा है| श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं परन्तु गौओं से प्यार नहीं करते हैं| अतः यह मानकर पूजा करो कि वे हैं|

क्लैव्यता है तुम्हारी कि मानसिक दुर्बलता को छोड़ो, हर वह पर्व तुम्हारे लिये उत्सव का होगा जब हम किसी दुर्बलता का त्याग कर पायेंगे|

भगवान आज भी वही हैं, क्योंकि हम ये मा न कर उनकी पूजा नही करते कि नहीं हैं|

वह परमात्मा सभी प्राणियों  में समान रूप से विद्यमान है|

जब तक श्रीकृष्ण नाम को धारण नहीं करेंगे, तब तक वह हमारा सहारा नहीं बनेगा|

मेरे तो गिरधर गोपाल कहने वाली मीरा  ने गोपाल को हृदय में धारण किया था, तभी तो विष भी हंसते हुये पी गईं और विष का उन पर कोई प्रभाव भी नहीं हुआ|

Tej Prakash, Lucknow, U.P., India

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