समभाव ही योग है

योगस्थः कुरु कर्माणि 
संगत्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धिमसिद्धयोः समो भूत्वा 
समत्वं योग उच्यते।। 
                    -गीता-2/48

  ‘‘हे अर्जुन! तू योग में स्थित होकर, सिद्धि-असिद्धि में समान बुद्धि रखते हुए,
आसक्ति को त्याग कर, स्वधर्म-रूप कर्म का आचरण कर। मन का ऐसा
 समभाव ही योग कहलाता है।’’

 योगी मन वाला ही भगवान की शरण में हो पाता है।  मनुष्य योग साधने की तरह-तरह की प्रक्रियायें तो 
अपनाते हैं, पर सहज-साध्य, भगवान
के ज्ञान के रास्ते पर नहीं चल पाते। 

योग,स्थिर हो कर, आँख बन्द करके बैठ जाना,
निष्क्रिय या निश्चेष्ट हो कर बैठे रहने की दशा नहीं है, 
यह तो कर्म करते हुए, खुली आँखों से, संसार में 
भगवान का दर्शन करते हुए ही पूर्ण होता है।असत्य की ओर जाने से रोक कर, सत्य की ओर मन को मोड़ देना, योग की आवश्यकता है।

असत्य नाशवान् है। सत्य अक्षय और अनन्त है। इसका बोध यदि हो जाये, तो असत्य की ओर
 मन आकृष्ट भी क्यों हो, और उसे ही और
 भी पाने की चिन्ता भी क्यों करे? देह ही असत्य है, पर देह के द्वारा किये कर्म, परिणामशून्य नहीं होते हैं। 

वे बीज-रूप में चलते ही रहते हैं, अर्थात् फलते हुये, 
जीवन को परिणाम देते ही रहते हैं। तब पहचान जिस तरह बीज की होती है, उसी तरह से कर्म और उसके परिणाम का ज्ञान होना चाहिए। जब कर्म के विषय में ज्ञान है, कि अधर्म के कर्म, पाप-कर्म होते हैं, तब उनका परिणाम भी, दुष्परिणाम ही
होता है; फिर भी वे कर्म किसलिए हो जाते हैं?

 यहाँ पर कुछ स्थितियाँ सामने आतीं हैं। प्रथम तो 
मनुष्य, पूर्व जन्म के किये कर्मों के परिणाम.रूप भाग्य और संस्कार ले कर जन्मता है। इसके अतिरिक्त 
जैसा कि श्रीकृष्ण ने मनुष्यके स्वाभाविक गुणों के 
विषय में बताया है, तीन प्रकार के गुण है- सात्विक, राजसिक और तामसिक।

यह भी सत्य है कि हरेक में अलग-अलग ही कोई 
गुण, प्रधान होता है। पर यदि मनुष्य चाहे तो 
अपने गुणों को सात्विक गुण में परिवर्तित कर सकता है। 

किन्तु होता यह है, कि मनुष्य न तो इस विषय 
में जानता है, न ही जानना चाहता है, और अगर बताया भी जाये, तो वह इस बात को महत्त्व 
नहीं देता। 

मनुष्य अपने स्वभाव के आधीन ही कर्म करता रहता है। दूसरी स्थिति होती है मनुष्य के सामने उस 
समाज और धर्म की, जिसके बीच वह जन्म लेता है। 

समाज और धर्म, जहाँ तक वैदिक धर्म या श्रीकृष्ण के धर्म की जो प्रतिपादित परिपाटी है, उसके अनुसार तो, कर्म और स्वाभाविक गुणों के आधार पर, वर्ण या जाति का विभाजन किया गया है। पर एक गुणसेवा का गुण, ईश्वर-भाव, सभी में रहता है। 

अतः इन गुणों के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति अपने 
आपको परमात्म-तत्त्व की ओर ले जा सकताहै। 
किन्तु मनुष्य निर्णय लेने में दुविधापूर्ण स्थित में फँस जाता है, जब उसके सामने, समाज की बनाई हुई
 मर्यादाओं व धार्मिक मान्यताओं की बेड़ियाँ आ जाती हैं। वह उस शिक्षा के बीच पला होताहै, कि इनका पालन करना ही साधन है; और उनके प्रति कर्तव्य-पालन करना ही निर्धारित आवश्यक कर्म है,
 जिनका पालन न करने से, धर्म और समाज में 
स्थिति तो बिगड़ ही सकती है, पाप भी लगता है।    

– साभार श्रीकृष्णचेतनावतार देवी मॉं कुसुम जी द्वारा रचित “गीता सार” नामक वाणी खण्ड से

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कुपोषण

समस्या है कुपोषण की,

चिन्तायें पोषण की,

परन्तु किसके पोषण की;

स्वपोषण जरूरी है;

कुपोषण मजबूरी है|

गुलामी की कारा से,

आजादी से मुक्ति तक,

कौन हुआ पोषित है,

जनता कुपोषित,

नेता हुये पोषित हैं|

सदाचार कुपोषित,

भ्रष्टाचार पोषित है,

सत्ता पर आज भी,

कुशासन सुशोभित है,

दुःशासन जीवित है|

द्रौपदी पीड़ित है,

दुर्योधन सत्ता का,

कर रहा है शोषण,

जनता फिर किसी

कृष्ण को ढूँढती है|

हारे चाहे दुर्योधन,

शकुनि चाहे मिट जाये,

मिटता नहीं है दर्द,

मिलती नहीं दवायें,

बदलती केवल सत्तायें|

माया की सत्ता हो,

मुलायम का शासन हो,

कांग्रेस चली जाये,

भाजपा चली आये,

जनता तो मूरख है,

केवल ठगी जाये|

——–तेज प्रकाश